क़ुरआन में एक बात का जिक्र कई आयतों में कई बार हुआ है। मैं नहीं जानता कि आपने इस ओर ध्यान दिया या नहीं दिया। क़ुरआन में कई बार आया है कि तुम्हारा रब बहुत विवेक वाला है। रब विवेक वाला है, लेकिन यह हमें बार—बार क्यों बताया जा रहा है? दरअसल इसमें एक गहरा संदेश छुपा है। इसका मतलब है — तुम भी विवेक वाले बनो। विवेक का मतलब है — सोच—समझकर यह मालूम कर लेना कि सही क्या है और गलत क्या है। मगर क़ुरआन की इस नसीहत का सबसे ज्यादा उल्लंघन किया गया।
पिछले दो सौ साल में ऐसे अनेक मुस्लिम और हिंदू धर्मगुरु हुए हैं जिन्होंने इस नसीहत को भूलकर ऐसे—ऐसे निर्णय किए जिससे हमारी खूब हंसी हुई। आप ताज्जुब करेंगे कि पिछली दो सदियों में एक समय ऐसा था जब रेल यात्रा, समुद्री जहाज से यात्रा, प्रिंटिंग प्रेस के इस्तेमाल, फोटो खिंचाने को पाप घोषित कर दिया गया, हराम सिद्ध कर दिया गया। आज भी ऐसे उटपटांग प्रवचन पढ़ने को मिल जाते हैं जो नेत्रदान को हराम और धर्मविरुद्ध मानते हैं। उनके पीछे तर्क दिया जाता है कि जिस शख्स को आपकी आंखें लगा दी गईं, अगर वह उनसे कोई गलत—सलत चीज देखेगा तो उसका पाप आपके सिर आएगा!
कहां तक गिनाऊं, बहुत लंबी लिस्ट है! वे कहते हैं मोबाइल हराम है, वर्जित है, लेकिन उनके बड़े—बड़े जलसे मोबाइल से ही बुक किए जाते हैं। वे कहते हैं कि तस्वीर हराम है, निषिद्ध है, लेकिन उनकी जेबें नोटों से भरी होती हैं जिन पर गांधीजी की तस्वीर छपी होती है। वे कहते हैं टीवी हराम है, निषिद्ध है, लेकिन खुद टीवी पर ज्ञान बांटते रहते हैं।
वे पश्चिम को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ते, पर उनके बेटे—पोते पश्चिमी देशों में ही पढ़ाई—कारोबार करते हैं। डेढ़—दो हजार साल पुरानी बातों के लिए वे आज दुश्मनी जारी रखने का संदेश देना चाहते हैं। दिन—रात पश्चिमी चिकित्सा पद्धतियों को दोष देते रहते हैं, लेकिन अगर खुद बीमार पड़ते हैं तो आॅपरेशन इन्हीं पद्धतियों से कराते हैं। अगर मैं यह कहूं तो गलत नहीं होगा कि धर्म (हिंदू या इस्लाम) का सबसे ज्यादा नुकसान ऐसे ही लोगों ने किया है जो बिना विवेक का उपयोग किए उल्टे—सीधे नियम निकालते रहते हैं।
क़ुरआन की कई आयतों और महाभारत के प्रसंगों में यह पैगाम सहज ही मिल जाता है कि तुम्हारा रब तुम्हारे लिए आसानी चाहता है, बहुत मुश्किल नहीं चाहता। अगर रेलगाड़ी, हवाईजहाज, आधुनिक चिकित्सा, बिजली और इंटरनेट के अच्छे इस्तेमाल से हमारी जिंदगी बेहतर होती है तो इसमें बुरा क्या है!
करीब दो साल पहले पश्चिमी राजस्थान के एक पाठक ने देश में बढ़ते कट्टरपंथ पर चिंता जताते हुए मुझे एक ईमेल लिखा। उसका विषय इस प्रकार था कि वे साहब मुस्लिम थे और एक दुकान चलाते थे। उनके मौहल्ले में मुसलमानों के पांच घर थे। करीब 90 घर हिंदुओं के थे। उन्होंने यूट्यूब पर किसी पाकिस्तानी मौलाना के विचार सुने कि गैर—मुस्लिम के घर का पानी हराम है। अजब बात यह कि उन साहब के घर में जो नल लगा था उसमें पानी एक पंडितजी के घर से आता था। पंडितजी सुबह मोटर चालू करते। सबसे पहले मंदिर का कलश भरते। उसके बाद अपने मुस्लिम पड़ोसी के घर के लिए पानी खोल देते।
उन मुस्लिम सज्जन ने लिखा, जो लोग बिना सोचे—समझे इस तरह के बयान देते रहते हैं उन्हें हमारी तकलीफ का अंदाजा ही नहीं। इस देश में हिंदू और मुसलमानों का एक—दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता। अगर मैं उस पाकिस्तानी मौलाना की बात को गांठ बांधकर अमल करना शुरू कर दूं तो मेरे मां—बाप, बीवी—बच्चे प्यासे मर जाएंगे। पूरे पांच घर प्यासे मरेंगे तो क्या अल्लाह इससे खुश होगा?
आगे बताया कि पंडितजी के घर में राशन का पूरा सामान उस मुस्लिम पड़ोसी की दुकान से जाता है। उसी से बनी रोटियां उनका परिवार कई वर्षों से खा रहा है। दोनों को कोई शिकायत नहीं है। मेरे उस पाठक ने यह चिंता जताई कि देश में बढ़ता कट्टरपंथ (किसी भी धर्म का) हमें डराता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई बाबा यह प्रवचन दे जाए कि तुम मुसलमानों की दुकान से सामान न खरीदो। ऐसे बाबाओं का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। वे घंटे—दो घंटे की बयानबाजी कर अपने घर चले जाएंगे। पीछे से हम लोग एक—दूसरे के जानी दुश्मन बन जाएंगे।
देश की जनता को ऐसे कथित 'ज्ञानियों' से सावधान रहने की सख्त जरूरत है जो बेसिर—पैर की बातें कर हमारी जिंदगी को जहन्नुम बनाना चाहते हैं। धर्म जोड़ना सिखाता है, भाईचारा सिखाता है, एकता सिखाता है, विवेक का उपयोग करना सिखाता है, जरूरतमंद के काम आना सिखाता है। समाज को बांटना, नफरत फैलाना, हुड़दंग मचाना — ऐसा काम कोई अल्लाह या भगवान नहीं सिखाता।
इन दिनों सोशल मीडिया पर भी ऐसे संदेश खूब मिल जाएंगे जिनमें कहा जाता है कि धरती बदल जाएगी, लेकिन हम नहीं बदलेंगे। हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे।
हुजूर कौन कह रहा है कि आप बदलें? न बदलें, लेकिन अल्लाह या भगवान ने अक्ल का इस्तेमाल करने से मना तो नहीं किया ना! शरीर में अक्ल सबसे ऊपर इसीलिए बनाई है कि उसका इस्तेमाल सबसे पहले करो। इन्सान बनो, चैन से जीओ और दूसरों को सुकून से जीने दो। अगर इस धरती पर अमन—चैन बरकरार रहेगा तो ही अल्लाह खुश होगा, क्योंकि क़ुरआन में कहा गया है —
धरती पर बिगाड़ के इच्छुक न बनो, तुम्हारा रब बिगाड़ करने वालों को पसंद नहीं करता। (28/77)
— राजीव शर्मा (कोलसिया) —
(इस लेख के जरिए मेरा मकसद सिर्फ समाज को बांटने वाले धर्मगुरुओं से सावधान करना है। जो मौलाना और पंडितजी इंसानियत, नेकी और भाईचारे की बात करते हैं उन्हें मैं विनम्रता से सलाम / प्रणाम करता हूं।)
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