सऊदी की बीच सड़क में लोहे के बेड में लिपटी प्रवासी की लाश से मचा हडकंप

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सऊदी अरब के अबह़ा क्षेत्र में बीच में लोहे के बेड पर लिपटी लाश से हर कोई हौरान हो रहा है. बताया जा रहा है की यह लाश किसी प्रवासी ड्राईवर की है.ख़लीज टाइम्स के मुताबिक, एक कंबल में लिपटे एक आदमी का मृत शरीर तब एक रस्सी से बंधे हुए लोहे के बिस्तर के फ्रेम से बंधे कल रात पाया गया था.इस भयानक मंज़र का विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. सऊदी न्यूज़ वेबसाइट अल-सबक द्वारा सत्यापित सूत्रों के अनुसार, शरीर एक ऐसे व्यक्ति से संबंधित था जो अवैध रूप से क्षेत्र में रह रहा था. आधिकारिक सूत्रों ने अभी तक विचित्र घटना पर टिप्पणी नहीं की है.

बहुत बड़ा खुलासा हुआ , जानिए कौन था देहरादून मैं बीजेपी के ऑफिस मैं ज़हर खाकर मरने वाला

मेरे देश के लोगों, अब तो चेतो.... ये नफ़रत तुम्हें कुछ नहीं देने वाली....
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मेरे पड़ोसी शहर, उत्तराखण्ड के हल्द्वानी का रहने वाला प्रकाश पांडेय नाम का वो ट्रांसपोर्ट कारोबारी बीजेपी का पैरोकार था, ये पैरवी किसी अच्छे कारण से नही बल्कि बीजेपी की मुस्लिम विरोध के कारण थी, प्रकाश पांडेय को मुस्लिमों से बेहद नफ़रत थी, इस नफ़रत का खुला इज़हार उसकी फेसबुक पोस्ट्स में देखने को मिलता था, जहाँ उसने कहीं मुस्लिमों को "सूअर की औलाद" कहा था तो कहीं वो हत्यारे शंभूलाल रैगर तक का सपोर्ट करता था... वो कहता था कि "हमें दो घण्टों का समय मिल जाए, फिर वो मुल्लों को दिखायेगा"
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.... प्रकाश की इस प्रवृत्ति को बीजेपी की राजनीती बड़ा बल देती थी, इसीलिये तो उसने हमेशा बीजेपी का ही बढ़ चढ़ कर सपोर्ट किया था, जब देश और उसके प्रदेश में बीजेपी की सरकार आई थी तो प्रकाश को ऐसा लगा कि अब "स्वराज" आया है, अब सब कुछ अच्छा होगा, मुल्लों को भी उनकी औक़ात पता चल जायेगी... मगर हुआ कुछ और ही... सत्ता मिलते ही बीजेपी ने ऐसे आर्थिक फ़ैसले किये जिससे उसके मुख्य सपोर्टर हिन्दू व्यापारी वर्ग ही की कमर टूटने लगी..... ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडेय का कारोबार भी नोटबन्दी की आपदा में खत्म हो गया,



...... ज़ाहिर है धर्म की राजनीती करने वाले अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सही नीतियां लागू करने की समझ नही रखेंगे ... फिर सत्ता तक पहुचने की सीढ़ी कुछ भी हो, सत्ता में पहुँचने के बाद नेता सब कुछ भूल कर केवल अपनी जेबें भरने और अय्याशी करने में जुट जाते हैं, ... प्रकाश पांडेय को इन सब बातों का एहसास हो रहा था, लेकिन अंतिम समय तक मुस्लिम विरोध की ग्रंथि से वो पार नही पा सका, अंतिम समय तक उसे आशा थी कि बीजेपी वाले उसकी ये "निष्ठा" देखकर पसीजेंगे, ... मगर उसकी विपदा किसी बीजेपी वाले ने नही सुनी, अंततः वो उत्तराखण्ड की (बीजेपी) सरकार में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल की सभा में सल्फास खाकर पंहुचा, मंत्री जी को उसने रो रोकर नोटबन्दी और जीएसटी के कारण बर्बाद हुये अपने कारोबार और तीन ट्रकों के लोन में डिफाल्टर होने की व्यथा सुनाई, बच्चों की फ़ीस तक न दे सकने का दुख सुनाया, इसके बाद 3 दिन तक अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलने के बाद वह चल बसा....
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. वो तो चल बसा, मगर तुम तो ज़िंदा हो न मेरे देश के लोगों, जो नफरत मे झुलसे हुए हो, अगर ज़िंदा हो तो देखो, आपस की नफ़रत से घर के चूल्हे नही जलते, आपस की नफ़रत से ज़िन्दगी नही चलती, तुम्हारे दिलों में नफ़रत के शोले भड़काने वाले, तुम्हारा भला नही बल्कि अपना भला करने की मुहिम में लगे होते हैं, अगर तुम ज़िंदा हो तो ये बात समझ लो और अब किसी के भड़काने में न आने का फ़ैसला कर के राजनीति वालों को उस बात पर मजबूर करने की आदत बना लो जो तुम्हारा भला करती हो...!!

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